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#ITeachIndia | एक बेहतर कल का संकल्प लिए Karmapath के द्वारा शुरू किया गया प्रयास

#IteachIndia

उस घर अंधेरा छा जाता हैजहां बच्चा स्कूल छोड़ आता है” – जितेंदर  सिंहसंस्थापक, Karmapath Development Foundation

भारत में कुल 23 करोड़ बच्चे स्कूल जाते है जिनमे से 50 प्रतिसत से भी अधिक नवी क्लास तक आते आते विद्यालय छोड़ देते है। शिक्षा वो विश्वास है जो समाज की छोटी इकाई परिवार से समाज की बड़ी इकाई विश्व तक को प्रकाश देता है। इस युग में अधूरे रास्ते शिक्षा का साथ छोड़ना अभिश्राप है। ये अभिश्रपित समाज का होना युही नहीं है, ये पैदा हुआ है हमारे लापरवाही से। बच्चों के विद्यालय छोड़ने का मुख्य कारण है, शिक्षा में गुणवत्ता की कमी, शिक्षक का न होना, माता-पिता का शिक्षा के तरफ झुकाओ। अगर इन कारणों को खत्म न किया जाए तो राज्य नहीं, बल्कि पूरा देश इसका परिणाम झेलेगा या झेल ही रहा है।

#स्वच्छ_जल अभियान

दिल्ली में अब #स्वच्छ_जल झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले परिवारों को छात्रों ने दिया सौगात ।
बिजली की बचत करने वाला #जल_शुद्धीकरण_यंत्र
#swajal
#ENACTUS
#DTU
#SwachhBharat
#karmapath

#ट्रांसजेंडर_समुदाय_से_संबंधित_मुद्दे

♦️कई अध्ययनों से पता चला है कि ट्रांसजेंडर लोगों के बीच बाल यौन शोषण, यौन हिंसा, कार्यस्थल पर हिंसा और घृणा जैसे अपराधों सहित शारीरिक और मौखिक हिंसा की दर काफी अधिक है।
♦️ट्रांसजेंडर समुदाय की विभिन्न सामाजिक समस्याएँ जैसे- बहिष्कार, बेरोज़गारी, शैक्षिक तथा चिकित्सा सुविधाओं की कमी, शादी व बच्चा गोद लेने की समस्या आदि।
♦️ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मताधिकार 1994 में ही मिल गया था, परंतु उन्हें मतदाता पहचान-पत्र जारी करने का कार्य पुरुष और महिला के प्रश्न पर उलझ गया।
♦️इन्हें संपत्ति का अधिकार और बच्चा गोद लेने जैसे कुछ कानूनी अधिकार भी नहीं दिये जाते हैं।
♦️इन्हें समाज द्वारा अक्सर परित्यक्त कर दिया जाता है, जिससे ये मानव तस्करी का आसानी से शिकार बन जाते हैं। साथ ही अस्पतालों और थानों में भी इनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है।
♦️भारत में आज भी ट्रांसजेंडर होना एक सामाजिक बीमारी समझी जाती है और उन्हें सामाजिक तौर पर बहिष्कृत कर दिया जाता है। इसका मुख्य कारण है कि इन्हें न तो पुरुषों की श्रेणी में रखा जा सकता है और न ही महिलाओं की, जो लैंगिक आधार पर विभाजन की पुरातन व्यवस्था का अंग है।
इसका नतीज़ा यह होता है कि ये शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं और बेरोज़गार ही रहते हैं। ये सामान्य लोगों के लिये उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का लाभ तक नहीं उठा पाते हैं।
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